Wednesday, 26 February 2014
Tuesday, 25 February 2014
Monday, 24 February 2014
सियासत की पिच पर धुंआधार बैटिंग करेंगे सिंधिया
सुधांशु द्विवेदी
मध्यप्रदेश के राजनीतिक क्षितिज के दैदीप्यमान सितारे केन्द्रीय मंत्री ज्योतरादित्य सिंधिया को भारतीय जनता पार्टी द्वा रा घेरने के लिये भारतीय जनता पार्टी द्वारा चक्रव्यूह रचने की कवायद लगातार की जा रही है लेकिन मौजूदा राजनीतिक हालात खुलकर यह संकेत दे रहे हैं कि सिंधिया को चुनावी सिकस्त दे पाना भारतीय जनता पार्टी के लिये मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन साबित होगा। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी एवं पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी के नवरत्नों में सुमार केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया वैसे तो समूचे मध्यप्रदेश में ही यूथ आईकान के रूप में अपनी प्रतिष्ठा स्थापित कर चुके हैं लेकिन ग्वालियर चंबल क्षेत्र में तो सिंधिया को राजनीतिक मूल्यों का अग्रदूत तथा विकास एवं जनकल्याण का स्तंभ ही माना जाता है। पूरी प्रतिबद्धता एवं प्रमाणिकता के साथ जनसेवा एवं लोककल्याण के नित नये आयाम स्थापित करने वाले सिंधिया ने सांसद एवं केन्द्रीय मंत्री के रूप में अपने पूरे कार्यकाल में क्षेत्र के जनता-जनार्दन को हमेशा विकासपरक सौगातों से नवाजने का काम किया है। यही कारण है कि निकट भविष्य में होने वाले लोकसभा चुनाव में अपनी ऐतिहासिक विजयश्री सुनिश्चित करने के लिये सिंधिया को अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। मेरा मानना है कि ज्योतरादित्य सिंधिया चाहे गुना-शिवपुरी संसदीय क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतरें या फिर ग्वालियर सीट से चुनावी भाग्य आजमायें, उनकी विजय सुनिश्चित है। सिंधिया समर्थकों के अपार उत्साह तथा क्षेत्रीय जनमानस के बीच केन्द्रीय मंत्री की निरंतर बढ़ती लोकप्रियता के सामने भारतीय जनता पार्टी के सभी सियासी समीकरणों के फेल होने का अंदाजा जनमानस को पहले से ही है। साथ ही भाजपा से लेकर संघ खेमे तक में सिंधिया को लेकर बढ़ी बेचैनी उनके पक्ष में पिछले चुनाव से भी ज्यादा मतदाताओं के ध्रुवीकरण का सकेत दे रही है। कहने का तात्पर्य यह है कि सिंधिया इस मर्तबा के लोकसभा चुनाव में और भी ज्यादा मतों के अंतर से चुनाव जीतने में कामयाब होंगे। राजनीति को लोकनीति का स्थायी स्वरूप देने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने विकास प्रक्रिया को हमेशा ही दलगत राजनीति से दूर रखा है तथा केन्द्रीय मंत्री के रूप में उनका रवैया मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार के प्रति भी हमेशा सहयोग पूर्ण रहा है यही कारण है कि उनके पुण्य प्रताप की बदौलत उनका राजनीतिक आभामंडल भी निरंतर निखरता गया है। चाहे मामला बिजली परियोजनाओं का रहा हो या प्रदेशवासियों को अन्य सौगातें दिलाने का, सिंधिया ने हमेशा ही सक्रिय, संवदेनशील एवं सजग जन प्रतिनिधि के रूप में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन प्रभावी ढंग से किया है। यही कारण है कि मौजूदा लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अन्य लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों के लिये अपने उम्मीदवार अघोषित तौर पर तय कर लिये हों लेकिन सिंधिया के खिलाफ पार्टी अभी तक कोई प्रत्याशी नहीं तलाश पाई है। भ्रष्टाचार एवं अवसरवादिता को लोकतंत्र एवं जनता-जनार्दन के लिये अभिषाप समझने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया व्यापक जनाधार वाले नेता होने के साथ-साथ प्रखर वक्ता भी हैं, जिनकी बेजोड़ भाषण शैली प्रदेश के अन्य लोकसभा क्षेत्रों के कांग्रेस उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने में भी मूल्यवान साबित होगी तथा अपराजेय योद्धा के रूप में श्री सिंधिया के राजनीतिक सितारे और भी बुलंद होंगे क्यों कि सियासत की पिच में ज्योतिरादित्य धुंआधार बैटिंग करेंगे।
Sunday, 23 February 2014
घातक है राजीव के हत्यारों की रिहाई की पहल
सुधांशु द्विवेदी
लेखक प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक हैं
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई के फैसले पर हालाकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगा दी गई है लेकिन इस समूचे घटनाक्रम ने देश की राजनीतिक बिरादरी की दशा और दिशा पर फिर गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है। राजीव के हत्यारों की रिहाई का फैसला करके खुद को गौरवान्वित महसूस करने वाली तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता का वैसे तो राष्ट्रीय स्तर पर कोई वजूद नहीं है तथा तमिलनाडुमें भी उनका राजनीतिक आभामंडल भी उनकी स्वार्थपरक प्रवृत्ति पर ही केन्द्रित है लेकिन जयललिता ने अपने राज्य में तमिलों के तुष्टिकरण के लिये पूर्व प्रधानमंत्री के कातिलों की रिहाई का फैसला करके यह सिद्ध कर दिया है कि देश के राजनीतिक नुमाइंदे अपने राजनीतिक विरोधियों के प्रति पूरी तरह असहिष्णु तथा नैतिक मूल्यों के प्रति पूर्ण रूपेण उदासीन हो गये हैं और वह अपने राजनीतिक फायदे के लिये अपराधियों को महिमामंडित करने के लिये किसी भी हद तक जा सकते हैं। हालाकि यह तो तय है कि जयललिता फिल्म अभिनेत्री रही हैं तथा उन्हें कानून का ज्यादा ज्ञान नहीं है। साथ ही राजनीतिक जवाबदेही और संवैधानिक प्रतिद्धता का भी उनमें घोर अभाव है लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि, एमडीएमके नेता वाइको सहित देश के वामपंथी दलों के कुछ नेताओं ने भी जयललिता के इस फैसले का समर्थन किया है। राजनीतिक विरोधियों को बर्बरतापूर्वक मौत के घाट उतारने वाले नृशंस हत्यारों के प्रति नेताओं में उमड़ता अति अनुराग यह सिद्ध करने के लिये काफी है कि आगे चलकर वह अपने विरोधियों की हत्या की सुपारी देने का कारनामा भी खुले तौर पर कर सकते हैं और जब कातिलों को सजा दिलाने की बारी आयेगी तो वह ऐसे मामलों में अपनी वास्तविक जवाबदेही और प्रतिबद्धता को पूरा करने के बजाय कातिलों को सिर में बिठाकर घूमेंगे। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस पूरे घटनाक्रम पर हैरानी व्यक्त करते हुए कहा है कि जब उनके दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री पिता को न्याय नहीं मिल पाया तो फिर देश के आम आदमी को न्याय कैसे मिलेगा। राहुल गांधी की यह चिंता वाकई में विचारणीय है लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि आखिर इन परिस्थितियों के लिये जिम्मेदार कौन है। राहुल गांधी केन्द्र में सत्ताधारी यूपीए सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं तथा शासन सत्ता सहित संपूर्ण व्यवस्था पर उनका सीधा हस्तक्षेप है तो फिर राहुल गांधी ने समय रहते ऐसे पर्याप्त प्रयास क्यों नहीं किये कि हत्या जैसे जघन्य मामलों के आरोपियों पर जांच एजेंसियों का शिकंजा इस तरह कसे कि अपराधियों पर जांच एजेसियों का शिकंजा इस तरह कसे कि उन्हें अदालत से किसी तरह की राहत मिलने की संभावना ही न बचे। न्यायालय द्वारा फैसले हमेशा ही तथ्यों, तर्कों और प्रमाणों के आलोक में किये जाते हैं तथा खास और आम व्यक्ति को यह उम्मीद रहती है कि उसे इंसाफ के मंदिर में न्याय अवश्य मिलेगा लेकिन कई बार निराशा ही हाथ लगती है। किसी भी मामले में जांच एजेंसी पर यह जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह हत्या जैसे जघन्य अपराधों में किसी भी केस को न्यायालय में किसी भी परिस्थिति में कमजोर ने होने दे। राजीव गांधी के हत्यारों को राहत देने की निरंतर चल रही कोशिशों के बीच यह कहना भी अति आवश्यक है कि तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि और उनकी पार्टी डीएमके वर्षों तक कांग्रेस पार्टी व यूपीए के अभिन्न सहयोगी रहे हैं तथा करुणानिधि व उनके परिजनों एवं रिश्तेदारों ने इस दौरान केन्द्रीय सत्ता का जमकर फायदा उठाया है तथा मालामाल होने के लिये समस्त नैकित और अनैतिक हथकंडे अपनाये हैं तो फिर इन सब परिस्थितियों के बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी व कांग्रेस के अन्य दिग्गज नेताओं ने करुणानिधि पर समय रहते राजीव गांधी हत्याकांड प्रकरण से खुद को दूर रखने का दबाव क्यों नहीं बनाया। तब तो गठबंधन धर्म और राजनीतिक जरूरत के नाम पर जिम्मेदारियों और प्रतिबद्धताओं को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा। सिर्फ इतना ही नहीं तमिलनाडु विधानसभा में तो राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई का प्रस्ताव भी पारित किया गया था। इस प्रस्ताव का भी करुणानिधि एवं उनकी पार्टी द्वारा समर्थन किये जाने के बावजूद कांग्रेस एवं राहुल गांधी ने इस मामले में प्रभावी तरीके से न तो आपत्ति जताई और न ही कोई संवैधानिक कदम उठाया गया। वजह साफ है कि तमिलनाडु में राजनीतिक फायदे के लिये कांग्रेस नेतृत्व ने भी सिर्फ रस्म अदायगी का काम ही पूरा किया जाता रहा तथा अब तमिलनाडु सरकार द्वारा राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई के फैसले के रूप में मामला हाथ से निकल जाने के बाद घडिय़ाली आंसू बहाए जा रहे हैं। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता द्वारा राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई की पहल बेहद दुर्भाग्यपूर्ण एवं घातक है क्यों कि क्षेत्रवाद व राजनीतिक तुष्टिकरण की राजनीतिज्ञों में बढ़ती प्रवृत्ति ने देश में अस्थिरता, अराजकता व वर्ग संघर्ष के हालात को पहले से ही बढ़ावा दे रखा है त था इस प्रकार यदि हत्यारों की रिहाई का राजनीतिक आदेश देकर उनका महिमामंडन किया जायेगा तो देश का लोकतांत्रिक ढाचा पूरी तरह छिन्न भिन्न हो जायेगा।
चर्चित चेहरों के चुनाव मैदान में उतरने से फायदे में रहेगी आप
सुधांशु द्विवेदी
लेखक प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक हैं
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिये अपने बीस उम्मीदवारों की सूची जारी करके राष्ट्रीय राजनीति में अपने धमाकेदार प्रवेश की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। देश की राजनीति में अलग तरह के आदर्शों की स्थापना करने का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी का प्रयास यह है कि वह आगामी लोकसभा चुनाव में अधिकाधिक सीटें जीतकर शानदार राजनीतिक प्रदर्शन के माध्यम से देश की केन्द्रीय सत्ता के निर्धारण में अग्रणी भूमिका निभाए। देश के मौजूदा राजनीतिक हालात देखकर ऐसा लगता है कि देश के जनता-जनार्दन को साफ-स्वच्छ, निर्विवाद और जनभावनाओं को पूरा करने वाले सशक्त राजनीतिक विकल्प की तलाश तो है। क्यों कि भाजपा के घोषित पीएम इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बीच चल रहा आरोप- प्रत्यारोप का दौर उन दोनों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और एक दूसरे को नीचा दिखाने तथा जनमानसस के बीच खुद को श्रेष्ठ साबित करने की उनकी अतिव्यग्रता को तो प्रदर्शित करता है लेकिन उनके द्वारा विभिन्न मुद्दों पर आत्म चिंतन और आत्म विश्लेषण के प्रति कोई गंभीरता नहीं दिखाई जा रही है। ऐसे में अरविंद केजरीवाल की साफ-स्वच्छ छवि और भ्रष्टाचार के खिलाफ खुली जंग छेडऩे की उनकी जद्दोजहद यह साबित करने के लिये काफी है कि यदि उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ ठोस कदम उठाने के लिये पर्याप्त अवसर और अनुकूल परिस्थितियों की प्राप्ति हो तो वह भ्रष्टाचार के प्रभावी उन्मूलन की दिशा में काफी सफलता अर्जित कर सक ते हैं। दिल्ली के पिछले विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी ने उल्लेखनीय प्रदर्शन करते हुए 28 सीटें जीतकर तमाम बड़े राजनीतिक दलों को न सिर्फ अचंभित कर दिया था बल्कि उन्हें यह भी सोचने के लिये विवश कर दिया था कि यदि उहोंने अपनी कथनी और करनी के बीच अंतर को खत्म नहीं किया तथा देश को राजनीतिक प्रयोगशाला समझकर छल, कपट, सुविधा, दुविधा और अवसरवादिता की प्रवृत्ति को खुद से दूर करने की कोशिश नहीं की तो देश के जनता- जनार्दन उनका वजूद मिटा देंगे। अरविंद केजरीवाल को अपने राजनीतिक प्रताप की बदौलत 49 दिन तक दिल्ली के मुख्यमंत्री पद को सुशोभित करने का भी मौका मिला तथा इस दौरान उन्होंने अपने चुनावी वायदे पूरे करने तथा भ्रष्टाचार उन्मूलन की दिशा में प्रभावी कदम उठाने की भी हर संभव कोशिश की। केजरीवाल की दृढ़ इच्छाशक्ति को इसलिये भी पर्याप्त सराहना मिलनी चाहिये कि उन्होंने गैस हेराफ़ेरी को लेकर मुकेश अंबानी सहित जिम्मेदार केन्द्रीय मंत्रियों के खिलाफ एफ़आईआर दर्ज करने का आदेश देने का साहस दिखाया। भारतीय लोकतंत्र की यह विडंबना है कि देश की चुनावी प्रक्रिया भी पूंजीपतियों व राजनीतिक माफियाओं के दुष्प्रभाव से मुक्त नहीं है। देश के कार्पोरेट घराने कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी जैसे बड़े दलों को करोड़ों रुपये का चुनावी चंदा देते हैं फिर इन राजनीतिक पार्टियों के सत्ता में आने पर सत्ता में भी सीधा दखल रखते हुएअपने फायदे के लिये मनमाफिक फैसले कराते हैं। अरविंद केजरीवाल ने अंबानी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश देकर भ्रष्टाचार एवं राजनीतिक अराजकता के खिलाफ अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय तो दिया है,इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। हां यहां यह कहना भी अत्यंत आवश्यक है कि अरविंद केजरीवाल को पारदर्शिता व भ्रष्टचार के मुद्दे पर अपनी करनी व कथनी का भी ध्यान रखना होगा क्यों कि ईमानदारी व नैतिकता किसी भी इंसान की व्यक्तिगत पूंजी है तथा इसका दिखावा हरगिज नहीं होना चाहिये। साथ ही किसी व्यक्ति को सिर्फ ईमानदार होना ही नहीं चाहिये बल्कि उसके व्यक्तित्व व कृतित्व से ईमानदारी झलकनी भी चाहिये। केजरीवाल की विदेशी फंडिंग को लेकर काफी सवाल उठते रहते हैं। स्वयं केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे भी कुछ ऐसा ही कह चुके हैं, इसके अलावा दिल्ली में व्हीआईपी कल्चर खत्म करने तथा सरकारी बंगला लेने या नहीं लेने पर भी केजरीवाल की कथनी व करनी में काफी विरोधाभास नजर आया है। केजरीवाल पर आरोप लगाये जाते हैं कि वह सनसनी फैलाने और चर्चा में आने के लिये किसी को भी भ्रष्ट करार दे देते हैं तथा उनके पास किसी को भी भ्रष्ट साबित करने के लिये पर्याप्त प्रमाण नहीं होते। केजरीवाल को चाहिये कि वह राजनीतिक विरोधियों पर आरोप लगाते समय अतिवाद से परहेज करें तथा वह व उनके अन्य सहयोगी भी शालीनता व शिष्टाचार की परंपरा का पालन करें। देश की राजनीति का मौजूदा दौर कुछ ऐसा ही हो गया है कि विरोधियों पर हमले बोलने व आरोप लगाते समय शालीनता व शिष्टाचार का ध्यान नहीं रखा जा रहा है, जो सभ्य-संभ्रांत जनों व जनता-जनार्दन को कतई स्वीकार्य नहीं है। भले ही राजनेताओं के लच्छेदार भाषणों, विरोधियों पर कटाछ करने वाले जुमलों तथा खुद को स्वनाम धन्य सिद्ध करने वाली अन्य बातों को सतही सोच वाले लोग पसंद करें लेकिन देश का अधिकांश जनमानस बनावटी व दिखावटी बातों की परख करना अच्छी तरह जानते हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर अरविंद केजरीवाल आगामी लोकसभा चुनाव की दृष्टि से सियासी रणनीति पर और अधिक प्रभावी तरीके से ध्यान केन्द्रित कर पायेंगे तथा उन्होंने लोकसभा चुनाव के लिये जारी उम्मीदवारों की अपनी पहली सूची में कई चर्चित चेहरों को मैदान में उतारा है, इसका उन्हें आगामी लोकसभा चुनाव की दृष्टि से फायदा होगा क्यों कि जनमानस का यह मानना है कि आम आदमी पार्टी द्वारा घोषित उम्मीदवार जनहित के जज्बे से परिपूर्ण तथा साफ-स्वच्छ व्यक्तित्व के धनी हैं।
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